तनी हुई डोर पे हल्की ठुनकी,
तरंगों की लंबी क़तार बह उठी,
ऐसा लगा कि दौरान ए मुहब्बत,
इश्क़ की आज़माइशें है हो रही,
ज़रा सी ढील से काट दी गयी,
ज़्यादे कसी डोर फिर तंग रही,
इक लोच के साथ उड़ाईये इसे,
वरना दूसरे के छज्जे जा बैठेगी,
हत्थे से काटने जो खींची डोरी,
क्या मालूम, माशूक़ की पतंग थी,
छत पे जो लहरा के गिराई पतंग,
मजमून पढ़ लिया तसल्ली हो रही,
उनका आना छत पर सँवर के,
पतंग ठुनकी दे इतरा के उड़ चली,
ग़ज़ब तब हुआ जब कहा उसने,
क्या बनोगे तुम मेरे जीवन की डोरी,
देखिए पतंग तब से है उड़ रही,
हिचकोलें लेते गिर रही उठ रही,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Andaz Lucknow ke
Ati sunder