आज फलों की हुई है बैठक,
नतीजा सामने है आने वाला,
फल अपनी अपनी हैं कह रहे,
सब करते दावे फ़ायदे रहे गिना,
अपनी ढपली पे राग अलापना,
क्या कोई नहीं है सुनने वाला,
अमरूद बोला आज दिन हमारा,
आम ने कहा हमारा आने वाला,
उधर से लीची शर्मा के बोली,
कम समय के लिये हूँ खिलती,
पर ज़ुबां पे मीठी हूँ लगती,
सेब रहा खड़ा इतरा,
समझता फलों को देवता,
तरबूज़ बोला मज़बूत अंदाज़ में,
भारी हूँ ज़रूर पर रखता हूँ हल्का,
मीठे खट्टे हैं मौसम्बी और संतरा,
अंगूर को देखिये बेल पे है चढ़ा,
शरीफ़ा ही है जो शरीफ़ रहा,
खाने का उसे अलग ही मज़ा,
इस बीच फ़ालसों ने ज़ोर से कहा,
जामुन के परिवार का क्यों समझा,
शहतूत के स्वाद का क्या ही कहना,
तूती बोलती उसकी, लगे जब ज़ुबां,
रसभरी, बैठी थी भरी, देख के समां,
आड़ू को साथ ले, कर दिया हंगामा,
ख़रबूज़े को देख ख़रबूज़ा रंग बदलता,
अनारकली पे अनार का दिल आ गया,
समझे वो ख़ुद को फलों का शहज़ादा,
क़ुर्बानी की ख़ीर कुर्बान ख़ुमैनी हुआ,
चढ़ा दिया गया सूली पे नादां पपीता,
कीवी अवाकाडो का स्वागत किया,
अतिथि देवो भवः यहां की परम्परा,
आम ने कहा ज़रा मेरी किस्में तो बता?
गिनी तो पता चला तीन सौ से ज़्यादा,
उथल पुथल के बीच चीकू आ निकला,
और दांव लगा रहा आंवले का मुरब्बा,
अब तक जामुन कोने में खड़ा चुप था,
बोला गुण बताने की कोई ज़रूरत क्या,
अनायास अनानास बीच में बोल पड़ा,
अच्छे तो होते हैं नाशपाती व बाबुगुशा,
केला स्वाद से भरा पर रह गया अकेला,
नारियल ग़ुस्से में ऊपर से कूद पड़ा,
इन्हीं के बीच बैठक का आया फ़ैसला,
आख़िर बैठक का नतीजा हुआ क्या?
सारे फल चखा रहे थे अपना ज़ायका,
सभी के अलग स्वाद सभी का फ़ायदा,
निष्कर्ष पे पहुंचे, बहसने से होगा क्या,
मौसमी बुखार तो हम सब पर चढ़ता,
गर्मी जाड़ा बसन्त के फल हैं अलहदा,
बिन बात की बहस बिन बात का नखरा,
छोड़ो ये रट्टा रोना छोड़ो नखरे दिखाना,
यही निकला नतीजा साथ साथ है रहना,
इसी में भलाई सबकी इसी में चैन है ना…
फल तो समझ गए अनेकता में एकता,
ये आदमी की समझ में कभी आयेगा???
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
So beautiful!
Thank you so much…