त्रैता युग ने,
रामायण रचाई,
और द्वापर में,
महाभारत रच आई,
आदमी को आदमी की,
सुध शायद ना आई…
कलयुग ही है ऐसा,
जिसमें बोलता पैसा,
पैसा खेल अनोखा,
पैसे ने है सिखाया,
ये दुनिया है इक माया,
माया ने जाल बिछाया,
फिर जाल में फंसाया,
अब हाल है कुछ ऐसा,
पैसे के आगे पीछे पैसा,
पूछा कि लग रहा कैसा,
आदमी है चुप खड़ा,
बस बोल रहा है पैसा…
जाल में फंसा है आदमी,
पर नहीं कोई आमदनी,
कैसे करें ईमान से कमाई,
सतयुग की याद जग आई…
वो दिन वो काल भी आयेगा,
आदमी आदमी बन जायेगा,
ये सोच ब्रह्मांड ज़ोर से हंसा,
और अपनी गति से चल दिया,
बोला मुश्क़िल है ये हो पाना,
आदमी का आदमी हो जाना,
सतयुग कलयुग सब हैं एक,
आराध्य जब हों “मुद्रा देव”
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
@”Mudrabdev” – beutiful gibe