ज़िंदगी की सरजमीं पर...
अपने अपने सच!!!
अपने अपने सच!!!

अपने अपने सच!!!

आदम की बस्ती में है मौकापरस्ती,
हर इंसान, इंसान में इंसान ढूंढ़ते हैं,

कितनी सफाई है ज़ुल्मों में उनकी,
कराहते हुए  दर्द,  ज़ख्म ढूंढ़ते हैं,

समन्दर में अंदर जा कर जो देखा,
सांस भरने बाशिंदे आसमां ढूंढते हैं,

गुनाहों की फ़ेहरिस्त है सभी की,
नासमझ हैं उनमें नाख़ुदा ढूंढते हैं,

सुना था रहनुमा हैं रहते ज़मीं पर,
आसमां से पूछा वो वहां ढूंढते हैं,

क्यों पूछो हमसे किधर जा रहे हैं,
थके हुए क़दम आशियां ढूंढ़ते हैं,

मासूम सी डायरी यूँ सोचती है,
सफ़े, स्याही में जाने क्या ढूंढ़ते हैं,

आपाधापी ज़िंदगी की है कुछ ऐसी,
झुंझलाऐ मन हर वक़्त तंज़ कसते हैं,

कोई क्यों ना मिलेगा इस जहाँ में,
ढूंढ़ने पर यहां  ख़ुदा भी मिलते हैं,

ये बात है अब सबकी ज़ुबाँ पर,
इंसानियत को अब इंसान ढूंढ़ते हैं,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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