ज़िंदगी की सरजमीं पर...
रस बनारस!!!
रस बनारस!!!

रस बनारस!!!

उसने हमें ज्यूँ देखा,
पासा हमपे यूँ फेंका,
साड़ी, जो पहने रेखा,
नायाब सा ये तोहफ़ा,
आप पे है फब रहा,
आप लग रहीं है रेखा…

ज़री, ये रेशम के धागे,
हाथ से इन्हें बुनवा के,
अभी अभी मंगाये हैं,
आप लें ख़रीद इसे,
फिर जहां भी जायेंगें,
निखरे नज़र आयेंगे,

रेखा, तो बस है कहना,
आप ही हैं वो गहना,
आप पर सजके साड़ी ये,
इसका दाम बना दुगना,
क्या आपको कुछ कहना,
साड़ी देते हुए वो बोला,
क़ीमत पूछ ना कीजिये हल्का,
पान बनारसी, मुंह कीजिये मीठा,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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