ज़िंदगी की सरजमीं पर...
इक शाख़!!!
इक शाख़!!!

इक शाख़!!!

इक शाम शरद की,
ठंड भी थी पड़ रही,
इक शाख़ दरख़्त की,
खिड़की से झांक रही,
लचीली लोच से भरी,
इशारों में कह रही,
मुहब्बत हूँ मैं,
ज़रा खोल खिड़की…

जो आई ऋतु बसंत की,
मौजें दिल में उठ रहीं,
वो शाख़ दरख़्त की,
फूलों से भर गयी,
भंवरे लगे मंडलाने,
शाख़ भी इतराने लगी,
धड़कने बढ़ाने लगी,
इक भंवरे ने गीत छेड़ा,
हूँ मुहब्बत का डेरा,
है मेरा मनमीत तू ही…

शाख़ फिर शाख़ ना रही,
जूही के फूल, चंपाकली,
डारी डारी है खिल रही,
महक़ महक़ से मिल रही,
भँवरे ने गुंजन छेड़ी,
गुंजन ने मादकता फेरी,
आहिस्ते भँवरे ने कहा,
अब है इक होने की बेरी…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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