ज़िंदगी की सरजमीं पर...
बोलती तस्वीर!!!(सिनेमा)
बोलती तस्वीर!!!(सिनेमा)

बोलती तस्वीर!!!(सिनेमा)

ज़िंदगी भी क़ाश तस्वीर की तरह होती,
तीन घंटे में हर ग़म, ख़ुशी में तब्दील होती,

सारी दुनियादारी पलों में गुज़रती होती,
ग़म और ख़ुशी कम कम वक़्त की होती,

सुकून रहता, चंद घंटों की मेहमां है ये,
जो भी करना है इन्हीं पलों में कर लेती,

ग़र ज़िंदगी है तो सारे अहसासात भी हैं,
कभी सुहानी तो कभी तल्खियां कहती,

चंद घंटों की तस्वीर का क़माल ये होता,
ज़िंदगी हंसती ज़्यादा, शायद ना ही रोती,

ग़र होती घंटों में, साथ संगी साथी होती,
वक़्त ही नहीं होता, कि अकेली हो पाती,

चंद घंटों में खाने की चिंता भी नहीं होती,
मिलता या नहीं मिलता, भूखी नहीं सोती,

उसने बख़्शी, कुछ अस्सी नब्बे बरस की,
इक दो बरस हटा, बाक़ी फ़िक़्र में गुज़री,

ज़िंदगी तस्वीर की तरह ही होनी होती,
हर इक क़तरे की अपनी कहानी होती,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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