हम उस नस्ल के बंदे हैं,
उस फ़सल के नुमाइंदे हैं,
जो बस ये सुन के बड़े हुये,
थे, अब गुज़रे क़िस्से हैं,
हमने ना देखा बापू को,
हमने ना खोया बापू को,
बस बापू कहके बुलाते हैं,
फिर क्यों हम उनके हिस्से हैं,
ज़हन हमारे वो बैठे हैं,
मन की बगिया बो बैठे हैं,
सच को सच वो कहते हैं,
है वहम नहीं, वो सच में हैं,
बापू, महात्मा कहलाते हैं,
अंतरात्मा तक वो जाते हैं,
सुना उन्हें दूसरों से हमने,
फिर अपने से क्यों लगते हैं,
आज़ादी दिलाई, हम ना थे,
गोली जब खायी, हम ना थे,
अंत में हे राम कहा, हम ना थे,
पर वो ज़ख्म कराहते हममें हैं,
बापू, नहीं कोई शरीर है,
बापू, बस समझ का तीर है,
उसे समझने में जो पीर है,
उस पीर में वो धीरज धरते हैं,
मन चेतन जो सचेतन हैं,
गहरा बड़ा इक चिंतन है,
उस चिंतन की गहराई में,
बापू हरपल पलछिन बैठे हैं…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बापू के प्रति अदभुत अभिव्यक्ति…. कविताओं के संग्रह शीघ्र प्रकाशित करें…. शुभकामनाएं….
शुक्रिया मित्र…