जल वायु अग्नि आकाश धरा,
कण कण ऊर्जा संचार हो रहा,
असीमित व्यापक विचारधारा,
ये धरा है धरोहर की रंगशाला,
अनूठा है बाल अनूठी है बाला,
हज़ारों साल से गणतंत्र हमारा,
आज समय गणतंत्र की पूजा,
इससे साहस है प्रश्न करने का,
इकदूजे के विचार सुनने का,
उनसे मतभेद प्रकट करने का,
मतभेदों को स्वयं सुलझाने का,
मासूम है यहां की परिपक्वता,
ढेरों प्रकार, हैं अनगिनत भाषा,
ना बोलें, पर सब समझ आता…
ना समझे जो यहां नहीं जन्मा,
क्या हैं विष्णु महेश और ब्रह्मा,
सीता काली व मीनाक्षी अम्मा,
कठिन है पा पाना ऐसी आस्था,
आस्था को आस्था समझ पाना,
मूलभूत है ये भारत की भावना,
इसमें क्योंकर कोई तर्क लगाना,
समस्त विषयों के अध्ययन का,
समस्त धर्मों के आगमन का,
इस धरा ने सदैव स्वागत किया,
वसुंधरा ने स्वयं में विलय किया,
संदेश वसुधैव कुटुम्बकम दिया,
अनन्तकाल से ये प्रेषित किया,
कोई विकल्प नहीं भाईचारे का,
आज गणतंत्र दिवस भारत का,
नमन करें इस धरती माता का,
है कारण हमारे अस्तित्व का,
फहरा रहा है चहुं ओर तिरंगा,
है तिरंगा अभिमान हम सबका,
सुरक्षित हम इसकी छत्रछाया,
सभी गणों को इसकी सुभेक्षा…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
जय हिंद