रेत, जो लहरों में बह के बाहर आ गयी,
ना ज़मीं की हुई ना समंदर में समा सकी,
किनारे रेत-क़तरे पैरों तले फिसलते रहे,
नाज़ुक सी ज़मीं बदन छू पिघलती रही,
समंदर फैला दूर तलक जहां नज़र गयी,
इकटक देखते देखते आंख ही सूख गयी,
है आशियां समंदर, समेटे है जज़्बातों को,
जब कभी अब्र छाये, बारिश जम के हुयी,
किनारे देर तलक सहते रहे थपेड़ों को,
जो टूट के बिखरे तो हलचल बहुत हुयी,
इक दिन साहिल समा गया समंदर में,
हुआ कुछ यूं के मुहब्बत टूट कर हुयी,
समंदर के रुख़सारों पे लाली है छाई हुई,
चलो किसी की मुहब्बत तो क़ामयाब हुयी,
इश्क़ की इंतेहा देखिये ज़रा समंदर की,
ख़ुद को बना बादल ज़मीं पर बरस गयी,
कहते है इक भले इंसां की मुहब्बत ने,
पत्थरों को पानी पे चलने की ताक़त दी,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
“RAIT KATAREIN”… Lajwab!