ज़िंदगी की सरजमीं पर...
तन्हां, मैं रह गया!!!
तन्हां, मैं रह गया!!!

तन्हां, मैं रह गया!!!

बीच अपनों के ही, तन्हां मैं रह गया,
टुकड़ा बादल सा, छिटका मैं रह गया,

ज़िंदगी खड़ी सामने हंसता मैं रह गया,
चाहने वाले कहते, मुझे रोता देखा गया,

अपना मान कर साथ बैठा मैं रह गया,
जो उनसे कहा तो कहा ऐंठा मैं रह गया,

दूर को पास समझ भटका मैं रह गया,
ख़यालों के बीच ही अटका मैं रह गया,

तन्हाई में ख़ासकर जगता ही रह गया,
हां, अपनों से अक़्सर डरता ही रह गया,

ठोकरें खा कर भी खड़ा मैं रह गया,
ज़िद पे जो अड़ा तो अड़ा मैं रह गया,

वो हैं हमारे ये सोच कर बरसों से मैं,
ख़ुद से ख़ुद ही बहलता मैं रह गया,

ये कमाल भी क्या कमाल है के हर दफ़े,
महफ़िल में हमें रुसवा ही करता रह गया,

बात आई, जलसे में शरीक़ होंगे वो भी,
हद्द तलक अहसान हमपर करता रह गया,

अपनों को अपना समझना गुनाह है क्या,
अपना ही कोई हमें शर्मसार करता रह गया,

सोचा था कि ख़ुशियां बांटने से बढ़ती हैं,
बांटना मगर, इक सज़ा बन कर रह गया,

नहीं चाहता था कभी के कुछ छुपायें ,
क्या यही गुस्ताख़ी मैं करता रह गया,

मुझे शक़ अब अपनी कही हर बात पर,
बीच सभी के मैं तमाशा बन के रह गया,

तन्हां मैं तन्हां, अकेला भटकता रह गया,
अपनों के बीच ही अटकता मैं रह गया,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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