ज़िंदगी की सरजमीं पर...
राम!!!
राम!!!

राम!!!

राह चलते चलते हमें राम मिल गये,
भाग्य में लिखा था, पहचान ना सके,
हमको तो हर दिन ही राम मिलते रहे,
आशंकित चित्त ने स्वीकार नहीं किये,

अंततः अंत आते आते लगा ये लगने,
अगर पहचान गये होते तो क्या करते,
इर्दगिर्द जब देखा जो नज़र घुमा के,
कभी मज़लूम में और कहीं जुनून में,
कहीं किसी के दर्द में, कहीं सुकून में,
आप में, निष्पाप में और चुपचाप में,
कभी बाम, कभी जीवन की शाम में,
औ कभी कभी करवट लेते आराम में,
कभी दिन रात में, कभी बात बात में,
राम राम में, और रणछोड़ के ध्यान में,
कभी हठखेलियों में कभी हथेलियों में,
रेखाओं में कभी, कभी रूपरेखाओं में,
नमन में, ध्यानमग्न में, नग्न स्वप्न में,
इन सबमें जो दिखे वो राम ही तो हैं,

है ग़र ये बात तो ये बात राम ही जाने,
ख़ुदा जाने, बुद्ध जाने, वाहे गुरु जाने,
कोई भी जाने या कोई ना भी जाने,
हमने ये मान लिया हम राम के दीवाने,

रहिये तैयार, के घर, राम हैं आने वाले,
कीजिये राम राम, के राम हैं आने वाले,
जलाइये दिये मन के, राम हैं आने वाले,
अबकी है मौका, के उन्हें पहचान सकें,
बुलाइये अंदर, के चौखट पे हैं राम खड़े,
खोलिये किवाड़ के राम प्रवेश कर सकें,
खोला जो किवाड़ हर ओर राम ही दिखे…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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