ज़िंदगी की सरजमीं पर...
सुबह सुबह!!!
सुबह सुबह!!!

सुबह सुबह!!!

सुबह सवेरे ख़ूब कहा,
मैं इधर तू उधर से आ,
दो दिन के सफ़र का,
दूर कहीं मिलेगा रस्ता,
बांध ले अपना बस्ता,
उदय हो जब सूर्य का,
नीर झर झर झर रहा,
झीलों का बना शीशा,
देख प्रतिबिम्ब आसमां,
उसे ज़मीं पर उतार ला,
चादर बना कर उसे बिछा,
टांक तारे उस पर, सजा,
और तंबू तान कर उसका,
देख तेरा, आसमां खिला,
मैं बैठा तुझे वहीं मिलूंगा,
हृदय का किवाड़ रख खुला,
“मनुशरद” का है वास वहां…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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