आजकल इक घर में, कई घर हैं बसते,
हैं मुख़्तलिफ़ जहाँ, घर के हर कमरे में,
अक़्सर, बहस में बदल जाती हैं बातें,
हो पाती नहीं गुफ़्तुगू, रु-ब-रु रह के,
रुमानियत बयां होती नहीं आँखों से,
मैसेज भेज देते हैं आशिक़ आज के,
हमसफ़र की मुश्क़िलें हैं बढ़ जाती,
जो आवाज़ लगा दी, बुलाने को उन्हें,
आजकल, घर ख़ामोशी में हैं बसते,
हर शख़्स के पास हैं अपने अपने पर्दे,
अब तकनीकें ही बोलती पाई जाती हैं,
ज़ुबाँ को आदत नहीं रही, के बोल सके,
खुलती है आंखें तकनीकी पर्दा देख के,
जब तक थक नहीं जाती, देखती हैं उसे,
मनुशरद अब पुराने ज़माने के हो चले,
आज भी बस बतियाना चाहती हैं नज़रें,
उन्हें देखकर जी भर जीने का दिल करे,
हाय ये ज़ुबाँ जब खुले आगबबूला करे,
नहीं जानते, ख़ामोश घरों में कोई कैसे रहे,
मज़ा नहीं, जो नोंकझोंक ना हो हमदम से,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Zabardast
बहुत खूब❤️
बिल्कुल सही बात कही
बहुत खूब
बिल्कुल सही बात कही