तरबियत थी ही ऐसी के अब क्या कहूं,
मैं अपनी ज़िंदगी को ख़ुद ही आसां हुआ,
अक़्सर ही हलक़ में फँस जाती है सांसें,
जज़्बाती सैलाब हावी हो जब हैरां हुआ,
मुलायम सी हौले हौले बहती हवा में,
तुझे देखा तो दिल में धायं धायं हुआ,
मौक़ा मिले तो पूछें ख़ुद से रूबरू हो के,
अदब और मुहब्बत का कैसे आना हुआ,
अभी अभी हुई मुहब्बत जिस नाचीज़ से,
और अभी ही हाय, रूठना मनाना हुआ,
उनसे नाउम्मीदी की उम्मीद है ज़्यादा,
वादा निभा ना पाना भी इक बहाना हुआ,
शिकायती पुलिंदों का क्या काम अभी,
अभी अभी तो शुरू हमारा फ़साना हुआ,
ज़मानों का क्या कहें आते जाते रहते हैं,
ख़ुद के साथ वक़्त बिताये ज़माना हुआ,
मुहब्बत होने के बाद की दुनिया है अलग,
कहते हैं मनुशरद के शुरू आज़माना हुआ,
हौसला रख के इसकी ज़रूरत पड़ेगी ही,
अब से सब्र का सब्र से साथ निभाना हुआ,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava