जमुना में उफ़न रही थी बाढ़,
घबराये थे वासुदेव महाराज,
कंस के डर का नहीं इलाज,
डरा मानुस होत घातक बेहाल,
देवकीनन्दन का सोच के हाल,
कंडिया में लिटाई के नंदलाल,
जाई लगे वासुदेव जमुना पार…
नंद के घर जा पहुंचे महाराज,
बताई के देवकी का पूरा हाल,
नंद गये समझ जब पूरा जान,
यसोदा के साथ लीन संज्ञान,
कंस ना बख्सिये उहकी जान,
जी का टुकड़ा कै दीन कुरबान,
बहुतै कठिन वक़त ई जान,
जसोदा गोद में लिहीन भगवान…
सुनौ आगे की कथा जजमान,
अष्टमी की रही भयानक रात,
कौनो ना जाने का भया कलरात,
सुबह खबर कि जसोदा बनी मां,
नंद गांव लगा झूमै खुसियां महान,
सारा बिरज लगा नाच रहा आज,
जसोदा के घर आये जो नंदराज,
जनम कन्हैया का मनावो आज…
कहत मनुशरद खुद को झंकझोड़,
दुनिया है फ़ानी औ लगी हुई होड़,
जबतक जिंदगी तभी तक की दौड़,
थोड़ा ठहर के जब देखा चहुँ ओर,
सांस ली हौले हौले ठहरे इक मोड़,
दिल दिमाग से हमने लिया ई सोच,
जायें जहां हम हमको है करनी मौज,
हर त्यौहार का मतबल मौज रहे रोज…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava