कुछ ढूंढ रहा हूं…
हैं कुछ जज़्बात रखे,
ख़त के लिबास में,
दिल की दराज़ में…
आपस में ये ख़त,
हैं गुफ़्तगू करते,
किसी के हो रहते,
क्यों हैं दराज़ में पड़े…
उधर…
कुछ संजीदा तजुर्बे,
माफ़िक़ हर्फ़ों के,
दिल की सराय में,
थे अटके हुए,
ज्यूँ इकदूजे से मिले,
ख़ुद ही बयां होने लगे,
इक ने उकेरी पुरानी बातें,
बातों के मोती बिखरे,
दूजे ने धागे में पिरो दिए,
तजुर्बे बेशक़ीमती हो गए…
और…
उस सफ़र के हिस्सों में,
जो बन गये, उन क़िस्सों में,
जो साथ साथ चलते चले,
कुछ तो फ़ना हुए रस्ते में,
कुछ छोड़ गये सब सस्ते में,
कुछ उभर रहे साथ चलते,
उन्होंने पकड़ा हाथ बढ़ के,
मिल गये…
जज़्बात, तजुर्बे वो क़िस्से,
साथ बह रहे दिलदरिया में,
शायद मिलने समन्दर से,
बहे जा रहे साथ वक़्त के,
ख़ूबसूरत क़लाम पढ़ते,
औ सबको सलाम करते,
महबूब से अपने मिलने,
जो पार है उस समन्दर के…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
“कुछ ढूंढ़ रहा हु, हैं कुछ जज्बाद रखे”…. बहुत खूब
Wah kya baat hai dada
शब्दों की बिसात तभी होती है जब कोई उन्हें रचनात्मक तन्मयता से पिरोता है ।
मनीष भाई जबरदस्त लिबास दिखा खत का।
एक और नाम जोड़ लीजिए आपके प्रशंसक की लंबी लिस्ट में।
शुक्रिया दोस्त!!!
Beautiful
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