कभी, क़द बड़ा और छोटा साया,
कभी, क़द से बड़ा हो गया साया,
है ये साया या है किसी की माया,
या धूप छांव के खेल ने छलाया…
बापू को पढ़ते पढ़ते बापू ही खो गये,
गहन धूप में तपे और गेहुँए हो गये,
बापू का क़द साया नाप ना सका,
इसी वजह से साया बौना रह गया,
दूसरे नज़रिये में साया हो गया बड़ा,
ज़िद पर आ कर अपनी है वो अड़ा,
कहने लगा तेरा साथ कभी ना छोड़ा,
गोली खाई तुमने औ शहीद मैं हुआ,
है ये आख़िर अपने नज़रिये की बातें,
कोई क़द लंबा और कोई बौना नापे,
किसी का वजूद कोई क्योंकर भांपें,
बापू शास्त्री के दिल में ज़रा तो झांके,
शायद हमें हमारी अस्मिता मिल जाये…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
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कोई कद लम्बा तो कोई बौना है नापे ….. है ये आखिर अपने नजरिए की बातें…. क्या खूब की है बापू – शास्त्री जी की बातें!!
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