ना समझते तो क्या करते,
बस शायद हां में हां करते,
छोटे अगर जो होते सपने,
सपने भी ना होते अपने,
खुलापन उनसे पाया हमने,
वरना खो जाते हम कबके,
कौन हैं जो कहलाते “उनसे”
अब मौन हैं जो बताते हमसे,
जब थे वो, बहुत थे हम छोटे,
अम्मा अम्मा थे कहते फिरते,
तबभी शायद थे हम समझते,
वो भी थे इक इन्सान सरीके,
इंसानी ही ख़ुशियां थीं उनकी,
औ इंसानों से दर्द भी थे उनके,
हां कुछ सीख लिया था उनसे,
के तरस नहीं खाते हैं ख़ुद पे,
जग की सदा से रीत रही ये,
जीत मिलेगी स्वतः संघर्ष से,
जूझो और सदा रहो जूझते,
आख़िर पा लोगे, हो जो चाहते,
ख़ासा आसां है पा लेना मंज़िलें,
शिद्दत से मेहनत की हो जी भर के…
कम समय में जितना जान पाते,
आज उसी से जग में मान हैं पाते,
भाषा अच्छी बोलो जो भी बोलो,
हिंदी, हिंदी में बोलो, मत तोलो,
हर भाषा है स्वयम् में सुंदर,
उनकी आत्मा को टटोलो,
सुंदर साहित्य स्वयं में उड़ेलो,
पढ़ो समझो बड़े हस्ताक्षरों को,
छोटों को संग ले लो अपने,
बुनो सहज सरल मधुर सपने…
अम्मा से लेंते हैं विदा कैसे?
नहीं हैं कभी वो विदा के लिये,
इतनी सुंदर मुखर उनकी यादें,
इक इक कर आंखों पर नाचें,
स्मृति चंदन धर अपने माथे,
कर प्रणाम नतमस्तक आगे,
शांत चित्त मन सब को साधे,
साधु साधु का वंदन बाजे…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Bahut unda
Umda Dada