रावण ने लिये कई अवतार,
पर इस युग में पहली बार,
घर के काम की थी दरकार,
सरकारी दफ़्तर से इस बार…
इक तो था वो सरकारी दफ़्तर,
उसपे काम करवाने का चक्कर,
लंकेश का ये था पहला अवसर,
हाल देख उनको आ गये चक्कर…
काम सौंपा अपने अफ़सर,
के ज़िंदगी के उस दफ़्तर में,
हरदिन इक लगाओ चक्कर,
यूंही लगाओ चक्कर अक़्सर,
ताक़ीद दी रावण ने खुलकर…
पर दफ़्तर हैं काम के राज्य,
होता नहीं यहां पे कोई काज,
आज कल, कल औ आज,
काम के राज्य का है ये हाल…
रावण तो ठहरे समझदार,
इसलिये लिया इस युग में,
प्राईवेट नौकर का अवतार,
ये समझने के लिये के कैसे,
चलानी उन्हें लंकेश सरकार…
रावण समझ गये ये बात, के
हाथ के नीचे रख दूजा हाथ,
रख लिफ़ाफ़ा भी साथ साथ,
नज़राने के साथ होते सब काज…
जब जान गये वो पुरसाहाल,
दशानन ने लगाया दरबार,
रावण के भाई भतीजा लाल,
बिन छीने मिले मोती ना हार,
वाह रे भइया दीनदयाल…
नियति फिरी उनकी इकदिन,
लंकेश भये वो जिस दिन,
औ बनाई अपनी सरकार,
वही करने लगे व्यापार,
जिसका करते तिरस्कार…
अब उनके यहां भी कामराज्य,
मार पिटाई अगुवाई सरकार,
करते उगाही हर दफ़े हर बार,
काम के अलावा सब ठीक यार…
आख़िर होता है वही हर बार,
जीत सच्चाई की बुराई पार,
बुराई की देखो हो रही है हार,
आज ढह रही रावण सरकार…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Bahut khoob
Ha ha.. aaj ka Ravan