ज़िंदगी की सरजमीं पर...
फ़नकार!!!
फ़नकार!!!

फ़नकार!!!

दानिशमंदों की बैठक में एक से एक ख़याल आये,
नाराज़ दिखे ज़्यादातर हां ख़ुश भी दो चार आये,

मौजूदा वक़्त में तकनीक के मुख़्तलिफ़ रूप दिखे,
ज़िंदगी से जूझते हुए जाने कितने ही पैग़ाम आये,

गहरी चली गुफ़्तगू में संजीदा सवालों की झड़ी देखी,
ऊंचे दर्जे की बहस में नतीजतन कोई हल ना पा पाये,

बड़े नामों को पास से देख कर नाउम्मीद हो गये,
उनको देखने पे ना सींग और ना ही ख़ुर नज़र आये,

आख़िर आदमी ही निकले जिन्हें फ़नकार समझे,
दर्द में रोते दिखे और ख़ुशी में खुलकर मुसुकुराये,

फ़नकार की सोच में दुनिया के नये आयाम देखे,
जब आम इंसान हुये रोज़मर्रा के काम करते आये,

रोज़ रोज़ मरती ज़िंदा होती हुई इस दुनिया में,
फ़क़ीर, फ़नकार, दिलदार जीते हुये नज़र आये,

दुआएं बिखरी पड़ी थी ग़रीब की कुटिया में,
उन्हें समेट कर उनकी तकिया के नीचे रख आये,

बेइंतेहा पेचीदे है यहां जीने के रस्म ओ रिवाज़,
फ़नकारों को ज़िंदगी के मायने कुछ समझ आये,

इक फ़कीर से मांगने गये थे दौलत जहान की,
करम उनका कुछ यूँ हुआ, मांगना ही भूल आये,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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