ज़िंदगी की सरजमीं पर...
क़वा’इद!!!
क़वा’इद!!!

क़वा’इद!!!

कुछ क़वा’इदें साथ हैं ज़िंदगी के,
कुछ मान्यताएं इंसा ख़ुद है बनाता,

वक़्त, उम्र बताने से बाज़ नहीं आता,
बेल के जैसे शरीर पर चढ़ता जाता,

और हर लम्हें जिन्हें ज़िंदगी है भाती,
उन्हें अक़्सर वक़्त समझ नहीं आता,

आपकी क़ैफ़ियतें हैं ख़ूबसूरत सी,
आपकी बातों में बुढ़ापा नहीं आता,

पड़ाव पार करना है इंसानी सिफ़त,
हर पड़ाव कुछ आग़ाज़ है करवाता,

आख़िर वक़्त है इंसान की इजाद,
इसे भूलने में किसी का क्या जाता,

गहरी मुहब्बत जी हो किसी ने अगर,
उन्हें ज़िंदगी का हर पहलू ख़ूब भाता,

मुबारक़ आपको हो आपका समय,
आलम आपका ये लम्हा है आपका,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

2 Comments

  1. Y Choyal

    आपकी कविता में ज़िंदगी, वक़्त, उम्र, इंसानी सिफ़त और मोहब्बत का ऐसा समावेश है कि हर शेर किसी न किसी दिल की बात कह जाता है।

  2. Y Choyal

    आपकी कविता में ज़िंदगी, वक़्त, उम्र, इंसानी सिफ़त और मोहब्बत का ऐसा समावेश है कि हर शेर किसी न किसी दिल की बात कह जाता है।

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