ज़िंदगी की सरजमीं पर...
अवगम(Perception) : घोंघा!!!
अवगम(Perception) : घोंघा!!!

अवगम(Perception) : घोंघा!!!

हर पारम्परिक बड़े से परिवार में इक ना इक बच्चा घोंघा होता है।
घोंघा समझे आप? नहीं ना, रुकिये हम समझाते हैं। अरे वही जो बरसातों में अपनी पीठ पर शंख रखे बस यूंही घूमता रहता है और इकदम नहीं की रफ़्तार से। अब समझे।

यानि, घोंघा घर का वो बच्चा होता है जिसके बारे में सबको यक़ीन होता है कि ये घोंघा है के ये कुछ ना कर पायेगा। और सबसे मज़े की बात है कि घोंघे को भी मालूम होता है कि वह घोंघा कहलाता है, इसीलिए कुछ ख़ास बातों पर वो बस मुस्कुरा के रह जाता है।

मान लीजिए के अपने घर के घोंघा हैं हम, और हैं ग़र घोंघा तो व्यवहार भी हमें करना होगा घोंघे सरीका। जैसे कि हर अक्लमंद बातों पर उल्लू की तरह देखते रहना और ऐसे जताना कि क्या ऊंचे दर्जे की बात हुई है जो समझ से परे थी हमारी। ज़िंदगी के कई क़िस्से हैं ऐसे जो अब किवदंतियों के हैं हिस्से।

पुराने ज़माने के घरों में जैसे चच्चा भतीजों से उम्र में छोटे हो सकते थे और मौसी घर की लड़की की हम उम्र हो सकती थी आदि इत्यादि…इसी पृष्ठभूमि को पर्दा बनाकर और उसके कैनवास पर चलचित्र चलाकर घोंघा को जाना जा सकता है

अच्छी ख़ासी उम्र गुज़र चुकी है मगर हम अभी बच्चे हैं, क्योंकि बड़े हमसे क़ाफ़ी बड़े हैं। मज़े की बात तो ये है कि बड़ों के बच्चे अब बाप बन गये हैं और वो बड़े भी हो गये हैं, लेकिन हम हैं कि अभी नादान ही हैं, दुनियादारी से अंजान भी हैं। हमें समझ आता है सब मगर जताना कुछ यूं है कि कुछ समझ नहीं आया, फिर ये कहते हुए कि क्या बताएं कुछ समझ नहीं आ रहा, आप राह दिखलाइये और बेड़ा पार लगाइये।

और उस घोंघें सरीके इंसान को सारा जीवन ये जीवन लीला खेलनी पड़ती है या यूं कहें के खिलाई जाती है और समझाई जाती है और पिलायी जाती है…अंजाने ही में सही, पर…

ये खेला खेलते खेलते घोंघा ये सीख जाता है और ढीठ हो जाता है कि चलना तो उसे धीरे ही है, और आख़िर उसको कोई भी मसला समझना भी चाहिए धीरे धीरे ही है …वरना वो घोंघा क्यों कहलायेगा। और ग़र वो अक़्लमंद हो जायेगा फिर इर्दगिर्द के समाज को मज़ा कैसे आयेगा…

उसकी धीमी गति और मंद बुद्धि(समाज के हिसाब से) उसे ज़िंदगी का वो गुण सिखाती रहती है जहां से वो इक विश्व दृष्टि पैदा कर लेता है और दृष्टा होने के क़रीब पहुंचता जाता है…ज़िंदगी के थपेड़े जो कभी उसे कमज़ोर करते थे अब उन्ही से वो शक्ति बटोरता है यानि दृष्टा बनने की तैयारी…

अब वो मंद मंद मुस्कुराता है, जान जाता है के दरअसल कौन कौन है कौन!!! उसकी मंद बुद्धि महकने लगती है रजनीगंधा सी, फाल्गुन की मंद मंद मादक महक में वो होता जाता है सराबोर और अपने घोंघा होने पर लगता है इतराने। और करता है शुक्रियादा उन सबका जिन्होंने उसे समझा घोंघा!!!

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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