ज़िंदगी की सरजमीं पर...
हाँ! ये वही है!!!
हाँ! ये वही है!!!

हाँ! ये वही है!!!

किसी ने कहा : “मिट्टी में मिलने से पहले मिट्टी से मिल तो लें”

और यूं शुरू हुआ ज़िंदगी का वो सफ़र जिसने घोंघे को इस दुनिया को बहुत क़रीब से देखने का मौक़ा दिया…हिंदुस्तान के मुख़्तलिफ़ हिस्सों को अंदर तक देखा उसने और हिंदुस्तान के अलावा दुनिया का ख़ासा बड़ा हिस्सा भी देखा…मिट्टी को सूंघा और चख़ा, मिट्टी में बसी सुगंध को अंगित किया, और जो महसूस किया वो इक ऐसा अनुभव था जिसे बयां करने में वो असमर्थ समझ रहा था ख़ुद को…

मुख़्तलिफ़ शख़्सियतों से मिलने और समझने के अनुभवों को इन सफ़र के दौरान जो उसने इकट्ठा किये, को यूं साझा किया इक दिन उसने…
इक से इक ख़ूबसूरत शख़्सियतों से मुलाक़ातों के दौरान उसने इक चीज़ बड़ी गहराई से महसूस की और वो ये कि अमूमन सभी लोग भले होते हैं बस उनकी ख़ब्त और झक अलग अलग क़िस्म की होती हैं…ख़ब्त यूं कि हम अपने अनुभवों से जो समझ पैदा करते हैं ठीक उन्हीं परिस्थितियों में दूसरा व्यक्ति इकदम अलग ही ख़ब्त रखता है और यही इंसानी अनुभवों की मीठी सी दास्तान होती है और इन्हीं से उपजती है उसके अपने अनुभवों को समझने की कहानी…

मिले कई शख़्स जिनकी तबियत होती है ‘विक्रम’ की और उन्हें मिल जाते हैं ‘बेताल’ भी गाहेबगाहे…कुछ तो वाक़ई में और कुछ उनके ख़ुद के पाले हुए…उनकी बस इतनी सी झक है और वो अपनी इन्हीं झक को ले कर यूं परेशान रहते हैं इस तरह कि झक पर उन्हीं का इकाधिकार है…

कुछ और क़िस्म की तबियतों से मुलाक़ात हुई, कुछ के साथ बात हुई कुछ लोगों से बहस चार हुई, कुछ ने कहा तो बुरा लग गया कुछ के साथ बात बन गई, यानि ज़िंदगी इन मुख़्तलिफ़ ख़ब्तियों के बीच खिलखिलाती रही…कुछ से मुहब्बत की बातें हुईं, कुछ की बातों से मुहब्बत हुई, किसी ने हाथ पकड़ बिठा लिया तो किसी ने दरवाज़े से टरका दिया, किसी के साथ सफ़र चला कुछ देर, किसी के हाथ दिल लुटा फ़रेब…किसी ने धोखा दिया फिर किसी ने थाम लिया…किसी को उसने धोखा दिया मगर उसने उसे मौक़ा दिया…कभी भूख को जिया उसने कभी भूख ने लील लिया …कहीं किसी को निवाले नहीं नसीब, कहीं किसी को खाना लगे अजीब…बहुतों के साथ अपनी नाकामियों का जश्न मनाया उसने, बहुत कम ही मिले जब सूरज मुस्कुराया उसपे…सफ़ेद झूठ बोलने वालों से अक़्सर ही मिलता है वो, सच कड़ुवा होता है उनसे भी मिला वो, मगर उसकी समझ में सच बस सच होता है…कड़ुवे और मीठे का जामा पहनाते देखा उसने…सिलसिला इस तरह चलता रहा, हर इक मुलाक़ात ने कोई ना कोई पैग़ाम दिया। उसने झुक कर ज़िंदगी का ऐहतराम किया…

था वो फक्कड़ और महा का घुम्मकड़, ना था उसे घमंड ना ही थी अकड़, हां ज़िद थी भरी हुई उसके अंदर ही अंदर और चाहत थी उसकी के वो जाने अपने अंदर का समंदर…फक्कड़ी को अपनी कहता है आवारगी और जीता है इक उन्मुक्त बंधनों से परे की…ज़िंदगी। कुछ कम कभी, कभी कुछ लंबी सांसे भरता है और हर वक़्त हर लम्हें को ज़िंदा रखता है…हां ये वही घोंघा है!!!

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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