ज़िंदगी की सरजमीं पर...
सवाब!!!
सवाब!!!

सवाब!!!

दिलपे था उसके ज़ोर, इक इल्ज़ाम दिया था उसे,
उसी ने दिया ज़ख़्म जिसने मलहम दिया था उसे,

इल्ज़ाम को थामे थामे, वो बिताता रहा ज़िंदगी,
जो कहना चाहता था वो कह ना सका किसी से,

क्यों दोष दें किसी को, ग़र ना वो अपना हो,
क्या यही वजह थी वो इल्ज़ाम रखता रहा सर पे,

मुहब्बत की थी क्या ही कहें कम क्या ज़्यादा,
अहसास थे असबाब ना थे जो तौल सकते इसे,

ज़िंदगी गुज़रती रही बस इस कश् म कश में,
वो इश्क़ कर ना सके हम मुहब्बत निभा ना सके,

(बनावटी)
मसनुई मुस्कान सी बसी हैं मनुशरद की आंखों में,
ना तजवीज़ ही काम आई ना ख़याल ही सीधे रहे,
(सलाह)

मांगें तो अब क्या मांगें उस परवरदिग़ार से,
दिया बहुत था उसने मगर हम संभाल ना सके,

इल्ज़ाम औ इल्ज़ाम से मिलते जुलते सवाब,(कारण)
इंसान है के मात खाता रहा, बस अपनी ज़ुबां से,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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