ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ३
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ३

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ३

इन्ही ख़यालों के बीच पहुंची घर अपने,
और सारी रात निकली बुनते हुए सपने,
हक़ीक़त से परे थे वो सपने जिन्हें मैंने,
अन्जाने चुन लिया था अपनी ज़िंदगी में,
सोचा तो था कि साकार करूंगी सपने,
आगे, ज़िंदगी क्या मोड़ लेगी कौन जाने,

चलते चलते उसी दुकान पर हम फिर मिले,
पहली मुलाक़ात को दो तीन महीने हुए होंगे,
अचानक दिल धड़का(उफ्फ़!!!बड़ी ज़ोर से),
उसे देखा मैंने दुकान पर दूर से आते हुए,
मैं तो कहीं और जा रही थी किसी काम से,
पर देख उसे जा पहुंची उसी दुकान में,

बहाना तो बनाना था ख़रीदने का मुझे,
पर क्या कहें देख उसे होश उड़े जाते हैं,
फिर वैसी ही बेहोशी तारी लगी थी होने,
के अबकी बार ख़ुद को संभाल कर मैंने,
पहली दफ़ा देखा सीधी निगाहों से उसे,
हाय!!! क्या ख़ूबसूरत हसीन चेहरा है,

पाया वैसा ही, जैसा था ख़यालों में मेरे,
अभी तलक देखा था कनकी निगाहों से,
जब देखा पूरा का पूरा वजूद उसका मैंने,
फ़ख़्र हो चला था अपनी पसंद पर मुझे,
सोच में पड़ गयी कि बात बढ़ाऊं कैसे,
बढ़ाना तो दूर, पास उसके जाऊं कैसे,

दिल कहता दूर तलक चलेंगे ये सिलसिले,
दिल ये भी कहता क़दम ज़रा संभाल के,
दिल अपना हो के भी रहा नहीं बस में अपने,
दिल की सुनी दिल ने कही दिल की बातें,
कौन समझता है इन्हें और कौन ही जाने,
दिल में ही ना रह जाएं जो कहनी है उससे,

निकल गये सोचते सोचते, दो चार महीने,
याद भी लगी थी थोड़ी थोड़ी धुंधलाने,
सिर्फ़ खिंचाव है या मुहब्बत कहते हैं इसे,
क्या कहें कैसी तबियत थी बस ख़ुदा ही जाने,
पहचानना मुश्क़िल था अपने ही कारनामे,
दिमाग़ कहता था सोच, दिल ना था बस में…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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