ज़िंदगी की सरजमीं पर...
मानता नहीं मन है!!!
मानता नहीं मन है!!!

मानता नहीं मन है!!!

ये बात मानता नहीं मेरा मन है,
के बेइंतेहा गहरा अकेलापन है,

शाख़ें जिस्म की लगी हैं सूखने,
यूं दूर अभी पतझड़ का मौसम है,

नींद को बुलाते रहते हैं रातभर,
देखो चांदनी भी हो रही मद्धम है,

ज़ुबां भी कुछ ऐसी ही पायी है,
जिसकी मिठास में भी खट्टापन है,

उस नावाक़िफ़ से कहें तो कहें क्या,
जिसने भेजा मेरी गली ये सूनापन है,

चेहरे को देखते हैं तो लगता है यूं,
क्या आईने की नज़र हो रही तंग है,

उस राह पे चल रहें हैं जाने कब से,
नहीं पता के आगे रास्ता ही बंद है,

मकां छोटे हो या बड़े, सच है यही,
के दिलों में रिहाइशें हो रहीं कम है,

ये मेरा ये तेरा की क़श म क़श में,
अब ग़फ़लत में रहने का ही मन है,

आवारगी भी कहने लगी है हमसे,
ख़ून में रवानी बहे ये क्या कम है,

तन्हाईयों में लफ़्ज़ लगते सनम हैं,
भई मुहब्बत तो नहीं कोई रस्म है,

अक़्सर सोचते हैं “मनुशरद” अब,
इन सबसे बेहतर तो अकेलापन है,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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