जल को पता ही ना चला,
जाने कब बर्फ़ बन ढल गया,
शायद ग़फ़लत में रहा होगा,
जब जम गया तब थम गया,
मारने चाहे हाथ पैर, पर नहीं,
दांव प्रकृति का मगर चल गया,
सर्द हवायें तेज़ बह रहीं हैं,
वो बहते बहते ही जड़ गया,
कुछ फ़र्लांग पे देखा उसने,
कलेजा जमने से बच गया,
धड़कने उसकी चल रहीं थीं,
चट्टान का सीना पिघल गया,
इक जगह ढलान से फिसला,
बर्फ़ का शिकंजा फिसल गया,
जल्दी जल्दी बह कर वहां से,
असीमित जल में जा जल गया,
अथाह समंदर से जा मिला,
लगे ये मिलना उसे खल गया,
पर जल तो आख़िर है जल ही,
जल भाप बन, बरस जल गया,
ऊंचे पहाड़ों से ऊपर उठ कर,
जल फोहों से बर्फ़ बन ढल गया,
“मनुशरद” कहते हैं ग़ौर कीजिए,
सफ़र में बस चोला बदल गया,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
जल ही है प्राण,
इसके बिना सूना संसार।
आओ इसका मान बढ़ाएँ,
हर बूँद को अमृत सा बचाएँ।