पाँच दहाइयां बीत गईं इंतेज़ार में कि मज़ा आयेगा, हर सुबह ये आशा आज के दिन की अभिलाषा कि आज मज़ा आएगा…आज, आजतक आया ही नहीं…फिर जो हुआ…
सुबह सवेरे घर की घंटी बजी, दूधवाला आया था, हमने चाय बनाई और हमसफ़र के साथ चाय की चुस्कियां लेते हुए ढेरों बातें हुईं जिनका कोई सार ना था किसी का इंतेज़ार ना था, वो पल बस चाय की चुस्कियों में मगन था, क्या कोई वहम था…उस दिन इक़दम अलग सा महसूस हुआ और मज़ा आ गया!!!
घर के सदस्यों से गुफ़्तगू हुई, कुछ हमने कहा कुछ उनकी सुनी और देर तलक़ ज़हन में वो बातें महकती रहीं, यक़ीन नहीं आया कि कितना ज़्यादा मज़ा आया…
लिखा कुछ पढ़ा, क़िताब उठाई पन्ने पलटे, इक दो सफ़े अच्छे लगे इक दो में दिल गहरा गया, पसीना सा आ गया, कभी हलचल तरंगित हुई कभी मन उमंग जगी और कभी सो भी गई…इनके बीच रह गुज़र हुई दिल गदगद हुआ…मज़ा आ गया!
इक घर बसाया, इक इक ईंट चुनी ख्वाबों की ताबीर बुनी, रोज़ हर रोज़ मिस्त्री को ईंट चुनते देखा, घर बनते देखा…इक कोने में ख़्वाब बोये, दूसरे क़मरे में देर तलक़ सोये, ना किसी ने खटखटाया क्योंकि दरवाज़ा अभी लग ही ना पाया, इस उधेड़बुन बनने बनाने में बड़ा मज़ा आया!
यानि ये समझ आया कि मज़ा समझने की व्यवस्था नहीं है, मज़ा बस मज़े की अवस्था है, इसमें ना आज ना कल है ये बस है इसी पल है!
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
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