ज़िंदगी की सरजमीं पर...
ख़तरा!!!
ख़तरा!!!

ख़तरा!!!

ये जो मुल्क़ ख़तरे में है,
ये जो मुल्क़ ख़तरे में था,
क्या मुल्क़ कभी भी
ख़तरे से बाहर था?
था तो हमें भी बता?

ये जो मुल्क़ बेच दिया है,
ये जाने क्या किया है,
क्या किसी जानिब से
ये पता चल है सकता?
मुल्क़ कैसे है बिकता?

देखने को मुल्क़ की दिशा,
मैंने मन मानचित्र है खींचा,
उसी में नया रास्ता बना,
मैंने ये भी सोच लिया,
ये रास्ता है भटकाता?

अपने नज़रिये की बात है,
किसी को दिखे है दिन,
किसी को दिखती रात है,
इसमें क्यों हो आपत्ति,
बहस की है बात क्या?

बात शुतुरमुर्ग आसन की है,
बात स्वछ प्रशासन की है,
साथ कोयले की दलाली है,
पिछली दफ़े भी यही थी बात,
पिछली दफ़े भी काले थे हाथ,
अब इसमें क्या है नया?

क्या करने से बात बनती है,
बनती है तो बिगड़ती है,
जब होड़ में किसीकी चलती है,
तो बाकियों की तो जलती है,
इसमें आश्चर्य ही क्या?

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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