बे इंतेहा सर्फ़ी सा दुकानदार,
सौ साल से भी पुराना व्यापार,
पैंतालीस अंश का था तापमान,
पारा चढ़ा जा रहा था आसमान,
पूछा कि कहां है “सेवा” की दुकान,
यहीं पे थी खसक़ गयी भाईजान…
दुकान सड़क के दूसरे छोर पे है,
पर शायद जो आप ढूंढ़ रहे हैं,
मिलेगा, इसकी गुंजाइश कम है,
हाँ हमारे पास है, इसका दम है,
हम रुक गये उनकी दुकान पे,
वो दिखाने लगे कपड़े शान से,
तौफ़ीक़, बोलने की अदायगी,
और इतनी इज़्ज़त अफ़ज़ाई,
अदब से पूछा क्या पसंद करेंगे,
मलमल दिखा, दिखायी कढ़ाई,
इसे कहते हैं हाथ की सफाई,
पसंद आई यहां की तुरपाई,
मौसम शरबत का और ठंडाई,
अँगरखा, कुर्तों पे अच्छी कढ़ाई,
जालीदार काम, हाथ की सफाई,
दिखाते, चेहरे पे उफ्फ़ ना आई,
काम की तारीफ़ हमसे करवाई,
फिर जा के खरीदने की बारी आई,
लखनऊ का लहजा ए तहज़ीब,
कोई अमीर हो के हो कोई ग़रीब,
इतनी तो सभी रखते हैं तौफ़ीक़,
बातें होनी चाहिये तुली हुई मुफ़ीद,
ज़िंदगी, काम नहीं है जल्दी का,
लखनऊ अहसास है ज़िंदगी का…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बहुत खूब सर
Lajavab !!
Kya baat hai. Beautiful as always!