क्या बताऊँ तुझे,
कैसे बताऊँ तुझे,
के हर बार उस पार,
लगती वहां नुमाइशें,
पूरी होती फरमाइशें,
चल ले चलूं तुझे,
के हर पल यूं लगे,
के जाना है उस पार,
आते हैं वहां नुमाइंदे,
कहलाते हैं ख़ुदा बंदे,
इक दफ़े सर झुका के,
मांगेंगे उससे इतरा के,
के कर दे नैय्या पार,
तू है तो साफ़ दिखे मुझे,
और कुछ भी ना चाहिये,
क्या बताऊं तुझे,
के जहाँ ऐसे भी हैं,
के लगे जहां जा कर,
बसूं यहीं के दिल बसते,
दिमाग़ यहां पे कम लगते,
चल अब वहीं चलें,
ज़िंदगी को लगा गले,
और करके दरिया पार,
मिलेंगे जिनसे दिल लगे,
और हंसेगे ठठा ठठा के,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
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