ऊपरवाला हम सब का इक है,
लेकिन हमारा सबमें सर्वश्रेष्ठ है,
कैसी विडंबना ये कैसा उत्तेज है,
ज़रा सी बात बवंडर बना तेज़ है,
सबका तरीक़ा मुख़्तलिफ़ ज़रूर है,
आदमी फिर भी आदत से मजबूर है,
जब लहू हम सबका सुर्ख़ लाल है,
तो इकदूजे से इतना क्यों मलाल है,
जज़्बातों का बयां, लगभग इक है,
आदमी, आदमी है, तो फिर नेक है,
पहनावे ज़रूर अलग अलग से हैं,
लगें मुख़्तलिफ़ पर हम एक से हैं,
ज़मीं को छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा है,
मालिकाना हक़ कह के उसे झांपा है,
इच्छा कि सबकुछ सेंत कर मढ़ लें,
बस चले तो सोच को भी क़ैद कर लें,
ग़र यही रहा मुआमला तो ख़ुदा जाने,
इस सोच से शुरू होते हैं फ़साद सारे,
ऊपरवाला ही जाने कैसे इसे झेले,
क्योंकि हमारा हक़, हर शह पे पहले,
ज़मीं खिसका के ले जा नहीं सकते,
वरना शहर को ही अपने घर रख लेते,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बहुत खूब, “ऊपरवाला”..