हवाएं आजकल सर्द चल रहीं हैं,
पेड़ों की शाखों पे ओस थम रही है,
इक शाख़ ने हाथ फैलाया ज़रा सा,
बरफ़ उसपे चादर सी जम रही है,
सांसों की गर्माहट धुंध कर रही है,
ठंड में ठिठुरते हुए हाथ मल रही है,
साथ साथ अलाव जला के बैठे हैं,
हांथ तापने से सर्दी कम लग रही है,
आने वाले समय की अगुवाई में,
बीते लम्हों की तुरपाई चल रही है,
धागों में पिरोये जा रहें हैं लम्हें,
वक़्त रोकने की बात चल रही है,
सर्दी से ख़याल तक जम रहे हैं,
पिघलाने की जुगत चल रही है,
साल दर साल क़िस्सों की दुहराहट,
नये किस्सों की बुनियाद पड़ रही है,
ज़रा दूर हुए, तपिश से अलाव की,
ठंड अब हड्डियों तक में जम रही है,
विरासतें यादों की उन्हें दे दी हैं,
नई पीढ़ी ने कमान संभाल ली है,
सोच में चिंगारी फुंकनी से फूंकी है,
ज़रा ज़रा आग सुलगती दिख रही है,
“मनुशरद” की माने तो ढक कर रहें,
सर्द ख़यालों पे बर्फ़ जमी दिख रही है,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Manani hi paregi “manusharad” ki baat kyunki Sharad rhitu ha khaas.