ज़िंदगी गुज़र रही अब ग़म में तेरे,
घाव भी हुए थे क़ाफ़ी गहरे गहरे,
जब साथ थे तो ग़म थे साथ के,
अलग हुए तो जाना, बिन बात के,
चले गये हो तुम तो अब क्या करें,
कुछ नहीं मुमकिन सिवा हाथ मलें,
मत बंद करो बातें, कहा था मन ने,
मजबूरी ही होगी के ना झांके मन में,
वजूद सारा मिल गया जब ख़ाक में,
मन ही मन पुकारा, तुम्हें दिनरात में,
बस हुआ यूं के तुमसे ये कह ना सके,
आंसू बन, नज़रों से तेरी बह ना सके,
रोने से क्या होगा जो लगे हो सोचने,
तुमसे थीं जो रिफ़ाक़तें, वो अब सपने,
दरमियां फ़ासले ना हों अपने प्यार के,
किसी ने टूट के कहा फिर ये जाते जाते,
पलटता नहीं, है वक़्त के फ़साने ये,
बहुत दर्द देता है, बाद गुज़र जाने के,
देखते देखते यूं मिल गये तुम ख़ाक में,
अब कैसे वक़्त गुज़ारुं तुम्हारी याद में,
तुम थे तो लगता था के इकदिन मिलेंगे,
क्या करें गिला अब किससे करें शिक़वे,
मज़ा था, झगड़ा था, पर था तो तुमसे,
इक इक पल रहा सोचता, दर पे खड़े,
ग़र ना हो ग़ैर मुमकिन तो एहतराम करें,
तुम्हारी यादों को दुआओं में सलाम करें,
बड़ा मुश्क़िल है कहना, प्यार है तुमसे,
ज़्यादे कठिन है कहना के मुआफ़ कर दे,
कहते “मनुशरद” के होते हैं गिले शिक़वे,
पर ये नहीं मुमकिन कि ना मिल सके गले,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बहुत खूब ॥
Bahut sundar hai yeh laine
बहुत खूब
बहुत खूब।।
वाह।
जहां चोट खाई वहीं मुसकुराना,
मगर इस अदा से के रो दे ज़माना।