छवि जो बन जाती है बचपन में,
उम्र भर वो चलती है संग संग में,
मालूम होता नहीं हमें बचपन में,
हवाला दिया जाता है पचपन में,
(छवि)
“सूरत” बन जाये अच्छी बचपन में,
वो दिल लुभाती है उम्र भर सुनने में,
ना बने सूरत अच्छी जो बचपन में,
अल्लाह मालिक उसका जीवन में,
क्यों हम रखते हैं रग़बत बचपन से,(इक तरफ़ा रुझान)
क्यों गुरेज़ है हमें इतना अज़मत से,
(हौसला)
बनाते हैं जब सूरत किसी की मन में,
अक़्सर जानते भी नहीं होते अच्छे से,
क्या करें के दस्तूर यही रिवाज़ हैं ये,
दिल के कर रखे हैं बंद किवाड़ जो ये,
मनुशरद ने बहुत पहले किया तय ये,
सूरत पहचानेंगे केवल सीरत देख के,
ग़र लगता है वक़्त इसमें तो लगता रहे,
सही कहते हैं सही करने में जल्दी क्या है,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
“बनाते हैं जब सूरत किसी की मन में,
अक़्सर जानते भी नहीं होते अच्छे से”… बहोत खूब।।।।