जो ग़ुबार बन रहे थे कहीं,
जो गर्द बन उड़ रहे थे कहीं
जो नहीं संभल रहे थे कहीं,
दश्त में ख़्वाब बोये थे कभी,
इनायत उनकी कुछ ऐसी हुई,
नज़रें घुमाईं जो तनिक सी,
ख़्वाब सारे के सारे उग गये,
ज़माने से जिनकी राह देखी,
ठहरी नहीं गर्द उड़ती रही,
सर्द आहें साथ चलती रहीं,
मीठे मीठे दर्द की टीस में,
रात सारी रात करवटें बदलीं,
अभी अभी हुआ है अभी अभी,
के पैरों तले ज़मीं खिसक गयी,
आने की उनकी आहट मिली,
ख्वाबों की जैसे ताबीर हुई,
असलियत में ख़्वाब हैं ये,
या ख्वाबों की है असलियत,
जान लेने से भी क्या होगा,
वो हमारे हुए, ज़मीं जन्नत हुई…
“मनु शरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
ख़्वाबों की ताबीर