पुरानी बात है और है भी सच, किसी की आंखो देखी है शायद, और हर कालखंड के लिए सार्वभौमिक लगती है…
बया के बच्चों को बचाने और घोंसले में घुसने की क़ोशिश कर रहे सांप को भगाने के लिये मोर डाल पर था सो रहा, नींद थी गहरी उसकी और सांप मौका देखकर मोर का गला घोंट देना चाहता था…पर वो ऐसा कर ना सका और उसकी सरसराहट से मोर जाग गया…आगे क्या हुआ होगा सबको विदित है…कोई भी नहीं अचंभित है। इतनी अभ्यस्त हो चुकी हैं सारी बयाएं इन सबसे कि उनके लिए ये घटित होना स्वाभाविक सा है तबतक जबतक के उनके घोसलों में असल में हमला ना हो जाये, सांप का, जो कि अक़्सर होता रहता है…उनका संसार वैसे ही चलता रहता है जैसे कि कुछ हुआ ही ना हो। हां डर ज़रूर जाता होगा पूरा का पूरा बया समाज, मगर कुछ वक़्त बाद सब कुछ पहले जैसा ही हो जाता होगा।
दरख़्त वो मंच है जिस पर बिसात बिछाई जाती है, बया और उसका घोंसला आम आदमी है, जो उच्चवर्ग के सिवा सारे वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं, सांप और मोर राजनीति की बिसात पर पक्ष/प्रशासन और विपक्ष/विभाजन का पासा बदल बदल कर खेलते रहते हैं…कभी ये उस तरफ़ कभी वो इस तरफ़ और बयाओं को पता ही नहीं चल पाता कि कौन सा पासा किस तरफ़ है करवट ले रहा…
ऐसा सा कुछ देखने को मिला उस दरख़्त पर, कि उस वक़्त की हो रही राजनीति सामने आ गई। क्या कोई फ़र्क़ दिखता है उस वक़्त की, किसी वक़्त की या अबकी राजनीति में?
प्रगतिशील समाज की सोच व समझ में भी …लपस्या का कोई विकल्प ना ढूंढ पाया मानव समाज, समाज के स्थापित होने से आज तक…बया, मोर व सांप की नियति यही सही, किंतु मनुष्य की लालसा, लोलुपता, जुगुप्सा का है कोई सानी…नहीं ना!
जाने क्यों घोंघा ये सोच कर भी ज़्यादा हैरां नहीं हुआ, हां थोड़ा परेशान ज़रूर दिखा…उसको ये समझ आ गया कि अंततोगत्वा ‘हुइये वही जो राम रचि राखा’…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava