धड़कनें बेचैन और मैं हूं ख़ामोश खड़ा,
बेवजह की उलझनों को हूं सुलझा रहा,
हैं क्या कुछ ऐसा के जिससे हूं डरा डरा,
भूचाल है मेरे अंदर, उससे हूं लड़ा पड़ा,
ये बेचैनी ही इकदिन जान लेगी मेरी,
पर चेहरे से चैन का बाशिंदा हूं बना रहा,
कोई दिल पे रखे हाथ मेरे तो पता चले,
धौकनी से फुंके कोयले सा हूं धधक रहा,
मुख़्तलिफ़ मिज़ाजों की इस महफ़िल में,
अंजान कैफ़ियतों की उलझने हूं सलट रहा,
हौसला रखता हूं और रहा भी हूं बिखरता,
इस सफ़र में मैं बनता, कभी रहा हूं बिगड़ता,
इक मौज है उसकी लहर पे रहा हूं झूलता,
सबकुछ है याद मुझे और सब रहा हूं भूलता,
हां हूं मैं ज़रा हट के, मगर हूं आसान रहा,
छू लिया है आसमान, ज़मीन हूं पकड़ रहा,
मौत से ज़रा कम इंसान से हूं ज़्यादा डरा,
मज़े की बात है इंसान पे ही हूं आ कर मरा,
गहरे मन में बैठी हुई सियासत में हूं फंसा,
इज़्ज़त ना उतर जाये हिफ़ाज़त में हूं लगा,
ज़िंदगी के खेल को है खेलना ही पड़ता,
सबक़ ये भी ज़हन में हूं उतारता चला,
सूत के धागों सी नाज़ुक सांसों का क्या पता,
जानते हुए भी इधर से उधर हूं हांफ़ता फिरा,
होती क्या ख़्वाहिशें हम जाने या वो जाने,
कहते हैं ‘मनुशरद’ उसी को हूं ढूंढ़ता रहा,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava