वो जो तुम कह रहे थे,
वो जो हम सुन रहे थे,
वो क्या तुम कह रहे थे?
यकीं ना हुआ ज़रा भी,
वो जो हम सुन रहे थे,
जो तुम चाह के नहीं कहे,
जो हम चाह के नहीं सुने,
वो जो तुम कह नहीं सके,
बिन कहे जो हम सुन गये,
वो भी तुम ही तो थे,
वो जो हम समझ रहे थे,
मसले जो समझ के परे थे,
कितना मजबूर कर रहे थे,
जीता देख खिल खिल उन्हें,
तिल तिल के हम मर रहे थे,
वो जो हर्फ़ ज़ुबां से निकले,
थे कितने तीखे और नुकीले,
वो जज़्बातों से रहते खेलते,
दिल की ज़रा भी ना सोचते,
उसने मैले कर दिए रिश्ते,
अब बस सन्नाटा है उस रस्ते,
ना गुज़रे मुसाफ़िर उस रस्ते,
ना ठिकाना है कोई उस रस्ते,
ना कोई फ़साना है उस रस्ते,
वो रस्ते अब वीरान से हैं पड़े,
वो जो रह जाते हैं बस क़िस्से,
क़िस्से जो ना हुए कभी हिस्से,
जो ज़माने ने फिर बुने क़िस्से,
वो जो टुकड़े सारे जोड़ के देखे,
बिखरे पड़े थे दिलों के हिस्से,
वो जब खुली हुई थी बाहें,
वो जो कह रहीं थी अपनायें,
बेदर्दी से जब उन्हें ठुकरायें,
उन्हें जो अब जोड़ना भी चाहें,
उनमें बसी हैं कितनी आहें,
वो जो धागे थे विश्वास के,
वो जो धागे थे अनुराग के,
वो जो मांगें थे हाथ उठा के,
वो जो सिलसिले थे प्यार के,
वो गिलों में क्यों बदल गये,
वो जहां रहती जारी कोशिशें,
वो जहां नहीं हारती कोशिशें,
जैसे मरुभूमि पे बारिश बूंदे,
वो जहां पे उलफ़त खिली रहे,
अक़्सर जीत जाती हैं कोशिशें…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava