ज़िंदगी की सरजमीं पर...
सधे कबूतर…

सधे कबूतर…

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

कबूतर जो सधे नहीं,
रहे वो अब गधे नहीं,
कहते फिरते हैं सबसे
कम दामों में गुज़ारा नहीं,

जिन्हें फ़ाख़्ते उड़ाने में,
आता था मज़ा,
होश उड़े बैठे हैं उनके,
कोई ठिकाना नहीं,

तीतर और बटेर की
लड़ाई  में जानेमन,
कबूतर की बिछाई बिसात,
में फँस ना जायें कहीं,

आजकल का आलम,
उल्लू की दुम फ़ाख़्ता,
नज़रों का होता है ख़ास,
क्या देखे और क्या देखे नहीं,

ईद पीछे चाँद मुबारक करने की,
आदत है पाली,
अब छुपाये ना बने और बनाये तो
बन ही नहीं रही,

कोई दिन तो आयेगा जब,
तड़प उठेंगें वो भी,
चबूतरे पे उनके दाने चुगने,
परिंदे यूँही तो आते नहीँ,

जब से साथ आये हैं,
फ़ुरसत नहीं सोचने की,
दिमाग़ ही लगाना होता,
तो दिल लगाते क्यूँ  हीं,

“मनु शरद”

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