ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नज़रिया

मानता नहीं मन है!!!

ये बात मानता नहीं मेरा मन है,के बेइंतेहा गहरा अकेलापन है, शाख़ें जिस्म की लगी हैं सूखने,यूं दूर अभी पतझड़ का मौसम है, नींद को …