ज़िंदगी की सरजमीं पर...
आज़ाद ख़याल!

पितृ-सत्तात्मक समाज का अंतर्द्वंद!!!

उसने कहा अपने घर आ कर,कि मैं अपने घर से आ रही हूं,मुझे दो पल लेने दो सुकूं ज़रा,बेहद थकी हूं, टूट के आ रही …