मानता नहीं मन है!!!
ये बात मानता नहीं मेरा मन है,के बेइंतेहा गहरा अकेलापन है, शाख़ें जिस्म की लगी हैं सूखने,यूं दूर अभी पतझड़ का मौसम है, नींद को …
ये बात मानता नहीं मेरा मन है,के बेइंतेहा गहरा अकेलापन है, शाख़ें जिस्म की लगी हैं सूखने,यूं दूर अभी पतझड़ का मौसम है, नींद को …
रेत, जो लहरों में बह के बाहर आ गयी,ना ज़मीं की हुई ना समंदर में समा सकी, किनारे रेत-क़तरे पैरों तले फिसलते रहे,नाज़ुक सी ज़मीं …
गहराए आसमां से झांकता धूप का टुकड़ा,चमकते समंदर पे तैर रहा, बन के धब्बा, लगे के यूं जैसे ज़मीं से अंधेरा रहा हो मिटा,अचानक उस …
आदम की बस्ती में है मौकापरस्ती,हर इंसान, इंसान में इंसान ढूंढ़ते हैं, कितनी सफाई है ज़ुल्मों में उनकी,कराहते हुए दर्द, ज़ख्म ढूंढ़ते हैं, समन्दर में …
इक कश्ती बहकती रही मौजों में,साहिल को बुलाती रही लहरोँ से,मौक़ा देख कर निकल है भागती,लौटना चाहती नहीं वो किनारों पे, उसे पसँद है दांव …