दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ५
क्या चाहिये आपको, क्या माजरा है,बोली मैं आहिस्ते से दुकानदार से,कुछ नहीं बस आती हूं किसी को ढूंढ़ने,दुकानदार ने पूछा आख़िर ढूंढ़ना किसे,ग़र हुलिया बताओ …
क्या चाहिये आपको, क्या माजरा है,बोली मैं आहिस्ते से दुकानदार से,कुछ नहीं बस आती हूं किसी को ढूंढ़ने,दुकानदार ने पूछा आख़िर ढूंढ़ना किसे,ग़र हुलिया बताओ …
देखो ना, ख़ुद ही ख़ुद बड़बड़ा रही मैं,ना जाने क्या क्या कहे जा रही थी मैं,सुनने वाला नहीं था कोई भी कमरे में,इसलिये बेधड़क हुई …
इन्ही ख़यालों के बीच पहुंची घर अपने,और सारी रात निकली बुनते हुए सपने,हक़ीक़त से परे थे वो सपने जिन्हें मैंने,अन्जाने चुन लिया था अपनी ज़िंदगी …
जबसे उसको अपना माना मैंने,इंतेज़ार बड़ी सज़ा है, ये जाना मैंने,इंतेहा तो तब हुई, नाम ना जाना मैंने,कैसा अनुभव, जिसे जीना जाना मैंने,और ये भी …
दरख़्त के पास वाली दुकान से,कुछ ख़रीद रहा था जब पहुंची मैं,देखा भी ना था मैंने उसे ग़ौर से,और क्यों ही देखूं किसी को मैं?जब …
वो सिमट जाना चाहती थी, उस वक़्त के क़रीब जाना चाहती थी, जहां उसने देखा था खुला आसमां और बैठी थी वो इक दरख़्त तले …
कुछ ढूंढ रहा हूं…हैं कुछ जज़्बात रखे,ख़त के लिबास में,दिल की दराज़ में…आपस में ये ख़त,हैं गुफ़्तगू करते,किसी के हो रहते,क्यों हैं दराज़ में पड़े… …
हृदय की रिक्तता का क्या कहिये,आपके होने पे खिला रहता था मन, कहूं कितना भी उभर गया हूं मगर,आपके होने से दिन होता था मगन, …
ऊपरवाला हम सब का इक है,लेकिन हमारा सबमें सर्वश्रेष्ठ है, कैसी विडंबना ये कैसा उत्तेज है,ज़रा सी बात बवंडर बना तेज़ है, सबका तरीक़ा मुख़्तलिफ़ …
और ना डालिए ज़ोर,डोर है बेहद कमज़ोर,बात मनवाने की होड़,मैं हूं मैं का नहीं तोड़,दो दो पांच का जोड़,कोई भी आये मोड़,चाहे जायें दुनिया छोड़,नहीं …