ज़िंदगी की सरजमीं पर...
ख़याल की ज़ुबाँ!

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ५

क्या चाहिये आपको, क्या माजरा है,बोली मैं आहिस्ते से दुकानदार से,कुछ नहीं बस आती हूं किसी को ढूंढ़ने,दुकानदार ने पूछा आख़िर ढूंढ़ना किसे,ग़र हुलिया बताओ …

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ४

देखो ना, ख़ुद ही ख़ुद बड़बड़ा रही मैं,ना जाने क्या क्या कहे जा रही थी मैं,सुनने वाला नहीं था कोई भी कमरे में,इसलिये बेधड़क हुई …

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ३

इन्ही ख़यालों के बीच पहुंची घर अपने,और सारी रात निकली बुनते हुए सपने,हक़ीक़त से परे थे वो सपने जिन्हें मैंने,अन्जाने चुन लिया था अपनी ज़िंदगी …

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग २

जबसे उसको अपना माना मैंने,इंतेज़ार बड़ी सज़ा है, ये जाना मैंने,इंतेहा तो तब हुई, नाम ना जाना मैंने,कैसा अनुभव, जिसे जीना जाना मैंने,और ये भी …

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १

दरख़्त के पास वाली दुकान से,कुछ ख़रीद रहा था जब पहुंची मैं,देखा भी ना था मैंने उसे ग़ौर से,और क्यों ही देखूं किसी को मैं?जब …

ख़त के लिबास!!!

कुछ ढूंढ रहा हूं…हैं कुछ जज़्बात रखे,ख़त के लिबास में,दिल की दराज़ में…आपस में ये ख़त,हैं गुफ़्तगू करते,किसी के हो रहते,क्यों हैं दराज़ में पड़े… …