ज़िंदगी की सरजमीं पर...
कम!!!
कम!!!

कम!!!

कुछ कम रह गया, कम रह ही है जाता, कम रहना है पूरा होने के तरफ़ का इशारा…मगर कभी पूरा नहीं हो पाता।

कम होना ज़्यादा होने की निशानी है, उन्हीं को कम पड़ता है जिन्हें दुनिया लुटानी है, कम होना शायद सफलता की कहानी है…

कम है तो ग़म हैं मगर ग़म कम हैं, पर क्योंकर ग़म कम हैं, शायद ग़मों को चाहिये वक़्त, जो साथ चलें फ़लक़ तक…मगर वक़्त ही तो कम है…तभी तो ग़म कम हैं।

वक़्त इक दरिया सही, बहता है लहरों पर ऊपर नीचे कभी नीचे ऊपर और बहा जाता है वो ओर समंदर, जहां उसके ग़म बंट जाते हैं औरों के ग़मों में घुल जाते हैं…समंदर है इतना फैला के दरिया के ग़मों का थैला हो जाता उसमें ग़ुम है…वहां और दरियाओं के भी बह के आये ग़म हैं…यानि ग़म बहते हैं और ज़्यादा में कम रहते हैं।

कम में जो सम है उसमें ख़ासा दम है, वो हर पल हर क्षण ले जा रहा है मुक़्क़मल होने की ओर…

कम हैं तो हम हैं, हम हैं तो ग़म हैं यानि हमारे लिबास में ग़मों का आवास है, तो फिर इक बांह में ख़ुशियां हैं दूजी में उदास है और लिबास की बायीं जेब में रखा है ताबीज़(दिल) जिसकी है तासीर कि वो कम, ग़म, उदास मन, को करता प्रसन्न है और है बताता कि कमी में सरलता और सहजता के पनपने का दम है…

सींग कटा कर बछड़ा बनने की कोशिश करना और असल में बछड़ा होने में जो अंतर है और उसे समझने की कोशिश में जो आनंद है वही मौज कम में है, कम की सीमा है अधिक अनंत है और जो अनंत है उसमें अधिक को परिभाषित करना ना केवल कठिन बल्कि नामुमकिन है…

कम की सीमाएं होते हुए भी कम को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता, क्योंकि जब कम है तो आगे बढ़ने का दरवाज़ा खुला है, सीमाएं अपनी परिधि को बढ़ाती रह सकती हैं…

अगर ऊपर लिखी बातों में तर्क है तो इनका कोई मतलब नहीं रह जाता, तार्किकता सीमित कर देती है ख़यालात और बांधती है सीमाएं जो कम को नहीं भायें क्योंकि कम में खुलापन है वो आज़ाद है…ख़यालात उड़ सकते हैं उन्हें पंख की ज़रूरत नहीं, ज़्यादा से वो वाक़िफ़ हैं कम की ख़बर नहीं!!!

कम आख़िर कम ही रह जाता है और इंसान की फ़ितरत है कि कम से ज़्यादा की ओर बढ़ता है जाता…कम, कम है और ज़्यादा है ज़्यादा, जाने फिर क्यों कम पड़ ही जाता!!!

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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