ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नुक़्ता चीं!!!
नुक़्ता चीं!!!

नुक़्ता चीं!!!

वक़्त से प्यार परवान है चढ़ रहा,
कोई है दीवाना और कोई बन रहा,
नफ़रत से मुहब्बत जागती है बाबू,
ना बोईये ज़्यादे कि अरमान बढ़ रहा…

बोलिये तौल के ये घर है लफ़्ज़ों का,
यहां की मिट्टी में शौक़ है गुंधा हुआ,
यहां हर शख़्स “आप” है कहलाता,
अदब की मिसरी क़िमाम संग खाता,

यहां बेअदब भी अदब से बोलता,
यहां सुपारी काटने को है सरौता,
हर घर कठौते में बहती हैं गंगा,
अदब से कहते हैं ठीक रखें लहजा,

यहां नुक़्तों का इस्तेमाल है बड़ा,
यहां नुक़्ताचीं है दिल भरा हुआ,
ग़म ए दिल या ख़ुशी का मुज़ाहिरा,
नुक़्ता हटाते ही मुंह के बल गिरा,

हवा पानी के जहाज़ में लगा नुक़्ता,
देखिये उन्हें डूबने से बचा ले गया,
इन नुक़्तों को हल्क़े में ना लीजिये,
ये ज़िंदगी का बढ़ा देते हैं ज़ायक़ा,

जाम छलकते दिखते आंखों से यहां,
आदमी है मोहतरम औरत मोहतरमा,
सारा का सारा रस्ता नज़रों में कटा,
ना बोले मोहतरम ना बोलीं मोहतरमा,

अजीब दास्तां है ये, कैसे करें बयां,
नज़र नज़र से कहती, ख़ामोश ज़ुबां,
इश्क़ की पेंचीदा हैं गलियां यहाँ,
हुस्न और इश्क़ सदा रहते हैं जवां,

अरबी को प्यार से कहते हैं घुइयाँ,
सास को मनाने बहू जाती है कुइयाँ,
यहां के घरौंदे कहलाते है आशियाँ,
यहां इश्क़ फ़रमाते बूढ़े औ नौजवां,

जिधर देखिये सभी है ख़लीफ़ा,
यहां के फलों तक में है शरीफ़ा,
गोभी बंद कहलाये करमकल्ला,
यहां अदबी हैं ईश्वर ओ अल्ला…

रखते हैं अपनी बुनियादों को याद,
अजायबघर नहीं, है बंदरिया बाग़,
अचंभा ना करिये बिल्कुल जनाब,
यहां की अवाम का है अपना रूवाब…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *