सुबह से रात बीच शाम होती है,
ज़िंदगी ख़बरों में तमाम होती है,
वक़्त की मियाद तय है आख़िर,
फ़िज़ूल ख़र्ची देख हैरान होती है,
हां हैं परेशानियां, कब नहीं होतीं,
राग अलापने से तंग ज़ुबान होती है,
माना नफ़रत है किसी से रज के,
इश्क़ की राह कब आसान होती है,
शिद्दत ना उड़ेलिये नफ़रतों में इतनी,
बे-ज़ुबानी में बड़ी कड़ी जान होती है,
हुक़ूमतों का उसूल शायद यही है,
बोलती ज़ुबानों में लड़खड़ान होती है,
सच कोने में ज़िंदा है सरकारों में,
वरना ढाँचें में कहां जान होती है,
सियासतमंदों की ख़ास बात होती है
दुनियादारी की बड़ी पहचान होती है,
मनु कहते हैं सियासत है तो सौदा ही,
हर मुल्क़ की अपनी दुकान होती है,
ईमान का बांट जिधर होगा भारी,
उसी मुआशरे की आन बान होती है,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Good One Manish ji, keep it up