है बहुत ही साफ़ सुथरा साबुन ये,
साफ़ हाथों को ही साफ़ है करता ,
हो जाएं हाथ जो गंदे कभी,
उन्हें साफ़ करने से इन्कार करता,
साबुन को भी सफ़ाई चाहिए,
यानि ये भी बनी बनाई ही चाहता,
फिर कौन है वो जो करेगा सफ़ाई,
वही करेगा मन ना मैला हो जिसका,
हम सब भी धुले हुए साबुन ही हैं,
दुआ यही कि सैलाब उठे गांधी जैसा,
चाहिए वो जो आईना दिखा दे,
मन की गंदगी को मन से हटाने का,
ख़यालों को साफ़ रखने के वास्ते,
हों ख़याल जो काम करें साबुन जैसा,
अब के बरस ज़हन में ख़याल धरें,
धो के साफ़ करें लें मलाल दिलों का,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
ठीक कहा भाई