ज़िंदगी की सरजमीं पर...
तुम हम!!!
तुम हम!!!

तुम हम!!!

इश्क़ की आज़माइशें तो देखिये,
तुम खिड़की पर हम छत पर,

उलझने कुछ ऐसे सुलझाई हमने,
तुमने फेंकी, हमने रख दीं छत पर,

रात ठंड से ठिठुरती उलझनों ने,
फिर आना बंद कर दिया हमारे घर,

तुमसे आसां हो जाते सारे मसले,
कहे ना कहे पर सच यही है मगर,

हमने फ़रमाया तू है तो सब है,
उसने बख्श दीं इनायतें भर भर,

जब चले थे तब से आजतक,
मुहब्बत से है लबरेज़ हमारा घर,

ये नहीं कि दरमियां फ़ासले नहीं,
कभी तुम कभी हम आये चलकर,

ए मुहब्बत तुझसे मांगते है कुछ,
हर दिल रहो हर दिल तुम्हारा घर,

तुमको आता है दायरों का अदब,
तल्ख़ियों से दूर रहे तुम उम्र भर,

मसलन ये कि सानी नहीं तुम्हारा,
ख़ुदा रहे मेहरबाँ हमेशा तुमपर,

फ़ैसलों का इम्तेहां आसां नहीं होता,
इसलिये दिमाग़ दिया है दिल के ऊपर,

मुज़ाहिरा क्या करें अपने इश्क़ का,
कहने में मज़ा कहां, जो है जगज़ाहिर,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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